पूँजीवाद को लाल सलाम लेख में अनिल त्रिवेदी द्वारा वामपंथीयो की निंदा के विरूद्ध खुला पत्र।
घोर कलयुग हैं भाई! हिन्दोस्तान में “सर्वहारा की राजनीति” के अंतिम बचे झंडाबरदारों को गाँधीवादी समाजवादी, पूँजीवादी विचारक, एन.जी.ओ., तथाकथित बुद्धिजीवी, उग्र वामपंथी, कारपोरेट मीड़िया सभी मार्क्सवाद सिखाने पर आमादा है। ज्योति बसु के कथित “समाजवाद अभी संभव नहीं” बयान पर जैसा बवाल मचाया गया उससे ऎसा लगने लगा कि जैसे मानो देश में आज ही क्रांति की जाना हो और वामपंथी इस क्रांति के राह में सबसे बड़े रोड़े हो। हिटलर के फासीवाद को आदर्श मानने वाले संघ परिवार ने तो एक कदम आगे बढ़कर माओवादीयों के सूर में सूर मिलाते हुवे भारतीय कम्युनिस्टों को चीन का अनुसरण तक करने की समझाईश दे ड़ाली। उधर ज्योति बसु की टिप्पणी के बहाने अव्यवहारिकता के धरातल पर खडे तथाकथित प्रगतिशील-समाजवादी चिंतको ने “वैचारिक दरिद्रता” का परिचय देते हुवे एक बार पुन: “समाजवाद” के हसीन ख्वाब को वामपंथी यथार्थवाद की चुनौती के रूप में पेश करने का प्रयास किया।
रही बात “समाजवाद त्यागने” संबंधी बयान की तो ऎसी कोई भी टिप्पणी ज्योति बसु ने कभी की ही नही। इसके विपरीत 22 वें बंगाल राज्य सम्मेलन के अवसर पर ब्रिगेड मैदान पर दसियो हजार लोगो की रैली को संबोधित करते हुवे ज्योति बसु ने कहा कि :- “हम मार्क्सवादी व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन चाहते है क्योकि हमारा अंतिम लक्ष्य वर्गविहीन और शोषणविहीन समाज की स्थापना के लिये समाजवाद निर्माण का है। लेकिन मात्र तीन राज्यो में अपनी सरकारों के दम पर यह लक्ष्य तत्काल हासिल करना संभव नहीं है। समाजवाद की प्रगति तभी हासिल की जा सकती है, जब वामपंथी व जनतांत्रिक शक्तिया इतनी मजबूत हो जाए की राष्ट्रीय स्तर पर एक विकल्प का निर्माण कर सके। जनता का विश्वास जीतकर मार्क्सवादी इस लक्ष्य को हासिल करने के भरसक प्रयास करेंगे।” इस टिप्पणी से हमारे प्रिय बुद्विजीवी जो मतलब निकालना चाहे निकाले, लेकिन ज्योति बसु की उपरोक्त टिप्पणी व बुद्धदेव, प्रकाश करात के बयानो में कहीं कुछ भी नया नहीं है, यह तो माकपा के तीन दशक पुराने पार्टी कार्यक्रम की लाईन है। हमारा कार्यक्रम तो दशको से देश के सामने है, लेकिन क्या हमारे समाजवादी बंधु स्पष्ट करेंगे कि भारत में समाजवाद स्थापना के लिये उनके पास क्या कार्यक्रम है? समाजवाद-समाजवाद का नारा लगाने से समाजवाद का निर्माण नहीं होने वाला। पूँजीवाद को कोसकर व समाजवाद को आस्था का प्रश्न बनाकर बहस से बचा जाना प्रगतिशील ताकतो के घोर गैर-जिम्मेदाराना चरित्र का द्योतक है। समाजवाद हासिल करने के राह में मौजूद चुनौतियों से जुझने व जनता को लामबंद करने की जिम्मेदारी समस्त प्रगतिशील ताकतो की है, लेकिन आज भारतीय वामपंथ को कोसने के अलावा इस दिशा में वे (गैर-वामपंथी प्रगतिशील ताकते) ओर क्या कर रहें है स्पष्ट करना चाहिये।
वामपंथी व जनतांत्रिक विकल्प को और विकास के अखिल भारतीय पूंजीवादी माडल के दायरे में एक हद तक सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए किये जा रहे संघर्ष का जनता के बीच बढ़ता हुआ समर्थन माकपा का किसी मृतप्राय: डोग्मा के बनिस्बत अपनाये गये अधिक व्यवहारिक रणनीति की प्रासंगिकता का सबूत है। साम्राज्यवाद के बाजारवादी हमलो के बीच अंतिम आदमी के अधिकारों की रक्षा “समाजवाद” का यूटोपियाई स्वप्न नहीं कर सकता। लक्ष्य प्राप्ति के लिये एक मंच पर आकर देश में व्यवहारिक सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक विकल्प पेश करना समस्त प्रगतिशील-वामपंथी ताकतो का फर्ज है और यही आज की ऎतिहासिक जरूरत भी है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें