शुक्रवार, 18 जनवरी 2008

भूमंळलीयकरण परमोधर्म!


प्रदीप भाई,
रोज सुबह अखबारों के पन्नो में विज्ञापनों के बीच खबरे खोजना गालीबन अपन जैसे बचे-कुचे फुर्सतिया-फालतु “आम लोगो” का ही शगूफा बचा है, आज की इस “भागदौड की जिंदगी” (इसके बारे में आगे कभी विस्तार से चर्चा करेंगे) में “खास इंसान” को दुनिया की खबरों की जानकारी से क्या लेना देना, वैसे भी इस फालतू माथापच्ची का काम उनका तो है ही नहीं। खेर छोडीये, उन्हें शेयर की कीमतो की पल-पल की जानकारी देने के लिये चोबीसो घंटे न्यूज चेनल व इंटरनेट तो है ही। साहब बुरा मत मानना, यह हिन्दोस्तान है पाकिस्तान नहीं! लेकिन कुछ तो वजह जरूर होना चाहिये जो पाक को हिन्दोस्ता का अक्स कहा जाये। गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी, निराशा, कुंठा, महंगाई, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता और साम्राज्यवादी हमला सरहद को धता बता रहा हैं वही साहित्य, कला, संस्कृति, इतिहास, विरासत भी हमारी साझा है। बस एक फरक मुझे दिखाई देता है वो है “लब की आजादी का”। हमें नक्कारखाने में तूती बजाने का अधिकार इस “प्रजातंत्र” ने जरूर दे दिया है पर सुने जाने का नहीं। इस एक मामले में कम-से-कम पाक की अवाम हमसे ज्यादा खुशकिस्मत निकली, आखिर पत्थर पर सिर फोडने का क्या फायदा? जब सुना ही न जाना हो तो लब की आजादी का क्या फायदा।एल.पी.जी. के ढिंढोरचियो ने कार्पोरेट मिडिया की मदद से ऎसा उन्माद का माहौल तैयार किया है जिसमें आम आदमी ही आम आदमी का दुश्मन बन गया है और खास आदमी इस सिरफुटव्वल का आनंद ले रहा है। “सांस्कृतिक विरासत” जैसा कुछ भुमंळलीयकरण के इस दौर ने बचा रहने दिया नही है। ऎसी विरासतो का जो मुसीबत के समय दुर्बल की लाठी न बन सबल को ही बल दे उनका इतिहास के कूडेदान में डाल दिये जाने का विलाप कम से कम हम जैसे बूतपरस्त तो कभी न करेंगे। अपने निकृष्ठतम रूप में इजारेदार वैश्वीक पूंजी आज नंगई के साथ सारी दुनिया पे छा जाने को बेताब है, और ऎसी विकट परिस्थिती में स्थानिय पूंजी के प्रतिनिधियो ने अपने देश के समाज, संस्कृति, सभ्यता, कला, साहित्य, इतिहास, धर्म, दर्शन, राजनीति को वैश्वीक पूंजी के लिये अनुकूलित करने का बीडा अपने कंधे पर उठा लिया है। आज जो संस्कृति फलफूल रही है, वो है - लाखो के पैकेजो की संस्कृति, महंगे मोबाईलो की संस्कृति, नित नये आ रहे इलेक्ट्रानिक गजेंटो की संस्कृति, क्रेडीट कार्डस की संस्कृति, रिटेल बाजार की संस्कृति, माल्स की संस्कृति, मेकडोनल्डस की संस्कृति, विज्ञापन की संस्कृति, शेयर बाजार की संस्कृति, ब्ला-ब्ला-ब्ला और न जाने कौन-कौन सी संस्कृति, संक्षेप में कहे ये सब संस्कृतिया “भुमंळलीयकरण की संस्कृति” का हिस्सा है। सोचकर बडा आश्चर्य होता है लेकिन “बहुसंख्यको” पर “अल्पसंख्यको” के राज को नयी सहस्त्राब्दी में पूंजी ने बुलंदी पर पहुचा दिया है। राजधानी में किसानों की आत्महत्याओ और उनके सवालों को लेकर जाने वाले जुलुसों के लिये स्थान नहीं है, लेकिन अंबानियों और पूंजीपतियो की मैराथन के लिये दिल्ली को संभालते पुरा प्रशासन जुटा नजर आता है यह भी संस्कृति का हिस्सा है । धर्म के नाम पर जुलुस स्वागत योग्य है पर मजदुर-किसानों की रैलीया जनता के लिये सरदर्द है यह भी संस्कृति का हिस्सा है । सांप्रदायिक दंगो के कारण चाहे कितने ही दिन शहर विराने रहे लेकिन मजदूर-किसानों की जायज बंद हडताले गैरकानूनी है यह भी संस्कृति का हिस्सा है । निजी चैनलों के धारावाहिकों में पग-पग पर स्त्रीयों का अपमान किया जा रहा है, अंधविश्वासों को बढावा दिया जा रहा है, कुरूतियों को जायज ठहराया जा रहा है यह भी संस्कृति का हिस्सा है । भगवानों को तो पहले ही बाट दिया गया था लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों को भी धर्म के आधार पर बाटने की संस्कृति चलन में आ रही है यह भी संस्कृति का हिस्सा है । वही बाजारवादी ताकते हमारी माटी के सपूतो को भी बेचने से बाज नही आ रहें है। “चे” को न जानने वाले लाखो नवयुवकों की पंसद “चे टी शर्ट” है यह संस्कृति हमारे यहा भी चल पडी है। भगत सिंह, चे, हसिया-हतौडा के फोटो वाले टी-शर्ट पहन माडल गर्व से कैट वाक कर रहे है, मजदूर-किसानों से अंतिम बचे प्रतीकों को भी छिनने की साजिश रची जा रही है यह भी हैं बाजारवादी संस्कृति का हिस्सा है । वाकई सोवियत-संघ न रहने की भारी कीमत तीसरी दुनिया के अंतिम आदमी को चुकानी पड रही है। सत्तावाद विरोधी विचारधारा का मिडिया में बढता प्रचार-प्रसार साम्राज्यवाद का “आम आदमी को राजनीती” से विरक्त करने के षडयंत्र का हिस्सा है इस षडयंत्र को बेनकाब कर आम आदमी की राजनीती को बल देने की संस्कृति की आज सबसे ज्यादा जरूरत है। तो कुल मिलाकर यह है पूंजी और हमारी सांस्कृतिक विरासत के बीच बनाये जा रहें समीकरण का नतीजा। बहस जारी है शब्दों, विचारों और समय की भी सीमा है लेकिन बहस में फिर मिलेंगे। सार्थक बहस आयोजित करने के लिये धन्यवाद।
कबीरा

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