पुराने गिले शिकवे भुलाकर गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर फार लेफ्ट से फार राईट, जी.ओ. से एन.जी.ओ., भगवा पार्टी से पंजा पार्टी, हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई-… सभी धर्मो के छटे हुवे कट्टरपंथी चौपाल पर एकत्रित हुवे। खबर लगते ही कबीरा भी चौपाल पर जा धमका। वहा भगवा पार्टी के प्रवक्ता अपने प्रवचन में कह रहे थे कि वे और उनकी पार्टी उत्साहित है क्योकि “समाजवाद” की शपथ लेने का पिंड छुटने के आसार नजर आने लगे है आखिर एक घोर दक्षिणपंथी पार्टी के लिये समाजवाद की दुहाई दिलवाये जाने ज्यादा अपमानजनक क्या हो सकता है? वैसे शपथ लेना व तोडना तो हम आजादी के बाद से ही करते आये है लेकिन हाँ इस बात का जरूर इतिहास गवाह है कि विदेशी राज में कभी शपथ लेकर न तोडी? शैक्षणिक संस्थानों में अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण के कानून पर वोटबैंक का खयाल कर हमारी पार्टी को सहमति देनी पडी, लेकिन भला हो सर्वोच्य न्यायालय का जो उसने संसद के इस अहम् फैसले पर रोक लगवा दी। उधर हाल ही में सुप्रिम कोर्ट ने अपनी एक अन्य व्याख्या में सरकार को एटमी करार समझौता संसद के समक्ष रखने से मुक्त कर हमें एक बार पुन: भारी धर्मसंकट से बचा लिया। अगर इन लाल झंडे वालो की चल जाती तो संसद तो छोडो अमेरीका में भी बेवजह हमारी भारी फजीहत हो गयी होती। चलो अंत भला तो सब भला! अरे थोडी पुरानी बात है इसी न्यायालय ने हिन्दूत्व को एक जीवन प्रणाली बताकर हम अस्पृश्यो की सांप्रदायिक राजनीति को कानूनी जामा पहनवा दिया, अगर आगे इसी तरह संविधान की अन्य अवधारणा जैसे धर्मनिरपेंक्षता को भी हटवाने में मदद मिले तो मजा आ जाये। अगर ऎसा संभव हुआ तो हम वादा करते है कि देश में संसद के स्थान पर सर्वोच्य न्यायालय का शासन स्थापित करने के लिये धर्मयुद्ध छेड देंगे। अब आते है दुसरे महत्वपूर्ण मुद्दे पर, वैसे तो हमारी भगवा पार्टी का विज्ञान से भला क्या लेना देना हम तो ठहरे आध्यात्म के पुजारी। लेकिन जब बात नासा के चित्रो की आयेगी तो उसपे कुछ कमेंट तो किया ही नहीं जा सकता हैं। अमेंरीका में इतने इंडियन जा चुके है कि आज अमेंरिका मिनी इंडिया बन चुका है, और नासा के अधिकांश कर्मचारी तो इंडियन ही है अब कल्पना चावला, सुनिता विलियम्स को कौन नहीं जानता हैं? अरे हम तो रामसेतु को जानते तक नहीं थे ये तो भला नासा वालो का जिन्होंने सेतु के विहंगम चित्रों को नेट पर जारी किया। अरे हमारे बजरंगीयो ने फ्रेम करा इन चित्रो को बेच-बेचकर ही इतना पैसा बना लिया की भंडारे के लिये चंदा उगाहने की जरूरत कम-से-कम अगले चुनावो तक तो न ही पडेंगी। अभी हमारे इस्कान के वैज्ञानिक भी इस खोज में लगे है कि मंगली एलियन का भारतीय धर्म-आध्यत्म से क्या तारतम्य बैठाया जा सकता है और हमें यकीन है कि रामसेतु के ही समान वे शीघ्र ही इस मिशन को भी सफलतापूर्वक पुरा कर लेंगे। लेकिन लगता है सर्वप्रथम किसी चाईनीज वेब में छपे इन चित्रों में कुछ मेनुपुलेशन जरूर किया गया है एक तो ग्रह का रंग लाल दिखाई दे रहा है जिसपर हमारे इस्कानिया बंधुओ का आग्रह है कि इसे केसरिया या भगवा होना चाहिये और एलियन का रंग हरा ही क्यों है यह भी जांच का विषय है। अरे खोजबीन की कोई जरूरत नहीं है मुझे तो इसमें चीन-ईरान की साजिश नजर आ रही है उन्होंने ही ग्रह का रंग लाल और एलियन का रंग हरा कर दिया है। नासा का अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है स्पष्टीकरण आ भी जाये तो क्या, रामसेतु के समान एलियन का सच भी हम कैसे भी करके अपने पक्ष में करके रहेंगे, वैसे भी हरे को भगवा और मंगल को गुजरात बनाने के लिये हमारे पास मोदीजी जैसे चमत्कारी नेताओ की कमी थोडे ही है। लेकिन कसम राम की खाते है मंगल तो छोडीये इन विदेशी आक्रंताओ को तो हम जहन्नुम भी नसीब न होने देंगे। जहा देखो वहा पहुच जाते है ये कटु.....
मामला बिघडते देख शांति समिति का कार्यकर्त्ता बीच-बचाव में कुद पडा, मामले को शांत करने के लिये उसने फरमाया कि सभी धर्म ईश्वर के अस्तित्व को मानते है अब अगर उसकी करामात से धरती पर जीवन हो सकता है तो वो जीवन को अन्य ग्रहो-चंद्रमाओ-सितारों कहीं पर भी बनवाने की ताकत रखता है। इस तर्क से सभी धर्मों के अनुयायी लाजवाब हो गये और मामला यही रफा-दफा हो गया।
मौका ताड हमारे दक्षिणपंथी पूंजीवाद के प्रवक्ता बोल पडे कि छोडीये जी इस झगडे को किस जमाने में जी रहे आप लोग? जमाना मंगल पर पहुंच चुका है और अगर मेंरे विश्वस्त सूत्रो की माने तो ये तस्वीर कुछ भी नहीं है हमारे अमेंरीकी आकाओ की तो शायद एलियन्स से कुछ गोपनीय डील भी हो चुकी है। अब अगर सुप्रीम कोर्ट ने भी क्लीन चिट दे ही दी है तो सभी को मिलकर एटमी डील लागू करवाने के लिये एकजुट हो जाना चाहिये। भाड में जाये इन लाल झंडे वालो का विरोध, अभी भी कुछ नहीं बिघडा है अमेंरीका के पिछे जाने में ही अक्लमंदी है समझे। समाजवाद-वमाजवाद भी बाबा-आदम के जमाने की बात है, इतिहास का अंत तो सोवियत संघ के साथ ही हो गया था पर मार्क्सवाद फिर भी यहा-वहा जिंदा रहा और हाल के दिनो में चावेज-मारेलस के उत्थान से लगने लगा की मार्क्स का भूत फिर लौट आया है लेकिन अब नासा के नये चित्रो ने बोलीवरीयो को तो छोडीये मार्क्स-एगेल्स के ऎतिहासिक भौतिकवाद और द्वंदवाद तक को इतिहास के पन्नो में दफन करवा दिया है। उधर डारवीन का विकासवाद भी शहीद हुआ समझो, अब तो नया युग आ गया है सभ्यताओ के अंत से भी आगे का युग याने पूंजीवाद के अमरत्व का युग।