मंगलवार, 29 जनवरी 2008

हरा मंगली एलियन

खबर है कि नासा द्वारा जारी चित्रों में मानव सदृश हरा एलियन लाल ग्रह की पहाड़ी से उतरता दिखाई दे रहा है। देखा जाए तो खबर में कुछ भी खास नही लगता है क्योकि विगत सैकड़ो वर्षो में मंगल पर मानव होने न होने संबंधी लाखो दावे-प्रतिदावे किये जा चुके है, पर अपने खबरची तो खबरची ठहरे जिसे चाहे खास बना दे जिसे चाहे खाक, वैसे भी विज्ञापनों के बीच छोटी-मोटी खबरे छापना उनकी पुरातन मजबुरी ठहरी। उधर मीडिया को भी स्टूडियों बैठे “ब्रेकिंग न्यूज” हाथ लगी, आखिर कडी प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिये चौबीसो घंटे सनसनीखेज-रोमांचकारी खबरे दिखाते रहना बाजार की डिमांड ठहरी।

वैसे सनसनी फैलाने का आजकल फैशन है, मीडिया के अलावा बुश टाईप राष्ट्रपति, उनके ओसामा छाप आतंकवादी, मोदीत्ववादी राजनेता इस फैशन के आज सबसे बडे पैराकार है। वैसे ये लिस्ट बहुत बडी हो सकती है पर इस लिस्ट में भारत की सर्वोच्य न्यायालय का नाम नया-नया जुडा है। खबर ये भी है कि सर्वोच्य न्यायालय ने अपनी न्यायिक (अति) सक्रियता के रिकार्ड को बरकरार रखते हुवे पिछले दिनो “समाजवाद” शब्द की जो व्याख्या दी उससे सारे देश में सनसनी फैल गयी, एक तरफ फार लेफ्टीस्ट-समाजवादी-सोशलिस्ट-गांधीवादी उत्तेजित है तो दुसरी तरफ फार राईट, सेंटर राईट उत्साहित। पर ये बात कबीरा की समझ से परे है कि इन खबरो से हमारे मोहल्ले के छुटभय्ये भला क्यो उत्तेजित-उत्साहित है?

पुराने गिले शिकवे भुलाकर गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर फार लेफ्ट से फार राईट, जी.ओ. से एन.जी.ओ., भगवा पार्टी से पंजा पार्टी, हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई-… सभी धर्मो के छटे हुवे कट्टरपंथी चौपाल पर एकत्रित हुवे। खबर लगते ही कबीरा भी चौपाल पर जा धमका। वहा भगवा पार्टी के प्रवक्ता अपने प्रवचन में कह रहे थे कि वे और उनकी पार्टी उत्साहित है क्योकि “समाजवाद” की शपथ लेने का पिंड छुटने के आसार नजर आने लगे है आखिर एक घोर दक्षिणपंथी पार्टी के लिये समाजवाद की दुहाई दिलवाये जाने ज्यादा अपमानजनक क्या हो सकता है? वैसे शपथ लेना व तोडना तो हम आजादी के बाद से ही करते आये है लेकिन हाँ इस बात का जरूर इतिहास गवाह है कि विदेशी राज में कभी शपथ लेकर न तोडी? शैक्षणिक संस्थानों में अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण के कानून पर वोटबैंक का खयाल कर हमारी पार्टी को सहमति देनी पडी, लेकिन भला हो सर्वोच्य न्यायालय का जो उसने संसद के इस अहम् फैसले पर रोक लगवा दी। उधर हाल ही में सुप्रिम कोर्ट ने अपनी एक अन्य व्याख्या में सरकार को एटमी करार समझौता संसद के समक्ष रखने से मुक्त कर हमें एक बार पुन: भारी धर्मसंकट से बचा लिया। अगर इन लाल झंडे वालो की चल जाती तो संसद तो छोडो अमेरीका में भी बेवजह हमारी भारी फजीहत हो गयी होती। चलो अंत भला तो सब भला! अरे थोडी पुरानी बात है इसी न्यायालय ने हिन्दूत्व को एक जीवन प्रणाली बताकर हम अस्पृश्यो की सांप्रदायिक राजनीति को कानूनी जामा पहनवा दिया, अगर आगे इसी तरह संविधान की अन्य अवधारणा जैसे धर्मनिरपेंक्षता को भी हटवाने में मदद मिले तो मजा आ जाये। अगर ऎसा संभव हुआ तो हम वादा करते है कि देश में संसद के स्थान पर सर्वोच्य न्यायालय का शासन स्थापित करने के लिये धर्मयुद्ध छेड देंगे। अब आते है दुसरे महत्वपूर्ण मुद्दे पर, वैसे तो हमारी भगवा पार्टी का विज्ञान से भला क्या लेना देना हम तो ठहरे आध्यात्म के पुजारी। लेकिन जब बात नासा के चित्रो की आयेगी तो उसपे कुछ कमेंट तो किया ही नहीं जा सकता हैं। अमेंरीका में इतने इंडियन जा चुके है कि आज अमेंरिका मिनी इंडिया बन चुका है, और नासा के अधिकांश कर्मचारी तो इंडियन ही है अब कल्पना चावला, सुनिता विलियम्स को कौन नहीं जानता हैं? अरे हम तो रामसेतु को जानते तक नहीं थे ये तो भला नासा वालो का जिन्होंने सेतु के विहंगम चित्रों को नेट पर जारी किया। अरे हमारे बजरंगीयो ने फ्रेम करा इन चित्रो को बेच-बेचकर ही इतना पैसा बना लिया की भंडारे के लिये चंदा उगाहने की जरूरत कम-से-कम अगले चुनावो तक तो न ही पडेंगी। अभी हमारे इस्कान के वैज्ञानिक भी इस खोज में लगे है कि मंगली एलियन का भारतीय धर्म-आध्यत्म से क्या तारतम्य बैठाया जा सकता है और हमें यकीन है कि रामसेतु के ही समान वे शीघ्र ही इस मिशन को भी सफलतापूर्वक पुरा कर लेंगे। लेकिन लगता है सर्वप्रथम किसी चाईनीज वेब में छपे इन चित्रों में कुछ मेनुपुलेशन जरूर किया गया है एक तो ग्रह का रंग लाल दिखाई दे रहा है जिसपर हमारे इस्कानिया बंधुओ का आग्रह है कि इसे केसरिया या भगवा होना चाहिये और एलियन का रंग हरा ही क्यों है यह भी जांच का विषय है। अरे खोजबीन की कोई जरूरत नहीं है मुझे तो इसमें चीन-ईरान की साजिश नजर आ रही है उन्होंने ही ग्रह का रंग लाल और एलियन का रंग हरा कर दिया है। नासा का अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है स्पष्टीकरण आ भी जाये तो क्या, रामसेतु के समान एलियन का सच भी हम कैसे भी करके अपने पक्ष में करके रहेंगे, वैसे भी हरे को भगवा और मंगल को गुजरात बनाने के लिये हमारे पास मोदीजी जैसे चमत्कारी नेताओ की कमी थोडे ही है। लेकिन कसम राम की खाते है मंगल तो छोडीये इन विदेशी आक्रंताओ को तो हम जहन्नुम भी नसीब न होने देंगे। जहा देखो वहा पहुच जाते है ये कटु.....

भगवाई की बात से खफा हो हमारे भाईजान तमतमा कर बोले चित्र मेनुपुलेट करना तो छोडिये तस्वीरे देखना-दिखाना ही ईस्लाम में कुफ्र है इन काफीरो की नासा जानबुझकर अल्लाह की तौहीन करने के लिये यहा-वहा तस्वीरे खिचते फिरती है? हम इनपर एतबार नहीं करते है। वैसे भी हम तो गये नहीं थे तस्वीर उतारने और अगर तस्वीर में एलियन हरा दिखाई दे रहा है तो यह हमारी फतह का सबूत है इससे भगवाई क्यो जल-भुन रहे है। इन काफीरो को तो.....

मामला बिघडते देख शांति समिति का कार्यकर्त्ता बीच-बचाव में कुद पडा, मामले को शांत करने के लिये उसने फरमाया कि सभी धर्म ईश्वर के अस्तित्व को मानते है अब अगर उसकी करामात से धरती पर जीवन हो सकता है तो वो जीवन को अन्य ग्रहो-चंद्रमाओ-सितारों कहीं पर भी बनवाने की ताकत रखता है। इस तर्क से सभी धर्मों के अनुयायी लाजवाब हो गये और मामला यही रफा-दफा हो गया।

मौका ताड हमारे दक्षिणपंथी पूंजीवाद के प्रवक्ता बोल पडे कि छोडीये जी इस झगडे को किस जमाने में जी रहे आप लोग? जमाना मंगल पर पहुंच चुका है और अगर मेंरे विश्वस्त सूत्रो की माने तो ये तस्वीर कुछ भी नहीं है हमारे अमेंरीकी आकाओ की तो शायद एलियन्स से कुछ गोपनीय डील भी हो चुकी है। अब अगर सुप्रीम कोर्ट ने भी क्लीन चिट दे ही दी है तो सभी को मिलकर एटमी डील लागू करवाने के लिये एकजुट हो जाना चाहिये। भाड में जाये इन लाल झंडे वालो का विरोध, अभी भी कुछ नहीं बिघडा है अमेंरीका के पिछे जाने में ही अक्लमंदी है समझे। समाजवाद-वमाजवाद भी बाबा-आदम के जमाने की बात है, इतिहास का अंत तो सोवियत संघ के साथ ही हो गया था पर मार्क्सवाद फिर भी यहा-वहा जिंदा रहा और हाल के दिनो में चावेज-मारेलस के उत्थान से लगने लगा की मार्क्स का भूत फिर लौट आया है लेकिन अब नासा के नये चित्रो ने बोलीवरीयो को तो छोडीये मार्क्स-एगेल्स के ऎतिहासिक भौतिकवाद और द्वंदवाद तक को इतिहास के पन्नो में दफन करवा दिया है। उधर डारवीन का विकासवाद भी शहीद हुआ समझो, अब तो नया युग आ गया है सभ्यताओ के अंत से भी आगे का युग याने पूंजीवाद के अमरत्व का युग।

चौपाल पर सन्नाटा छा गया कोई कुछ समझ नही पा रहा था कि क्या बोले? आखिर पूंजीवाद के प्रवक्ता की बात काटने का साहस तो उन किसी में न था।

लेकिन तभी सन्नाटा तोडते हुवे मोहल्लेवालो के चाट बाजार अर्थात प्रोफेसर साहब बोल पडे कि एटमी करार मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नया नहीं कहा है यह तो सर्ववीदित है कि सरकार बगैर संसद की अनुमती के एटमी करार पर आगे बढने के लिये मुक्त है इसीलिये लाल झंडे वाले संविधान में संशोधन करने की मांग कर रहे थे ताकि दिघ्रकालीन इमपेक्ट वाली विदेश और रक्षा संबधी नाजुक संधियो पर संसद अर्थात जनता के नुमांईदो की मोहर लगवाया जाना अनिवार्य हो सके। रही बात समाजवाद कि तो समाजवाद की व्याख्या करना सुप्रीम कोर्ट के दायरे के बाहर हैं। उधर ज्योति बसु समाजवाद पर अपनी टिप्पणी में कुछ भी गलत नहीं कह रहें, हमारे समाजवादी बंधु व्यर्थ की बहस में पडकर इसे अपनी आस्था का प्रश्न बना रहें है। आजादी के साठ बरस बाद भी भारत सामंतवादी पुर्वाग्रहो से मुक्त नहीं हो पाया है, साम्यवाद तो छोडीये समाजवाद ही आज की परिस्थिती में दुर की कोडी है। हमारे देश में तो अभी सामंतवाद पर पूंजीवादी हमलो का दौर चल रहा है, भारत में सामंतवाद के झंडाबरदार हमारे संघी मित्रो का मेकडोनल्ड्स संस्कृति, वेलेन्टाईन डे, न्यू ईयर सेलिब्रेशन का विरोध मेंरे तर्क को पुष्ट करते है। कही कोई विसंगती नहीं है मार्क्सवाद आज भी उतना प्रासंगिक है जितना मार्क्स के जमाने में था। समाजवादीयो-फार लेफ्टीस्टो की तरह आत्महत्या करने के स्थान पर वामपंथी-जनतांत्रिक विकल्प को और विकास के अखिल भारतीय पूंजीवादी माडल के दायरे में एक हद तक सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए लाल झंडे द्वारा चलाया जा रहे संघर्ष ही आज की ऎतिहासिक जरूरत है। रहा मंगल पर एलियन का सवाल तो इसे नासा अथवा किसी भी खगोलविज्ञानी ने पुष्ट नहीं किया है। यह तो.....

एक कला के विद्यार्थी ने प्रोफेसर की बात बढाते हुवे कहा कि - हो सकता है नासा के यान ने जो तस्वीरे ली है वो संयोगवश मानव जैसे दिखती चट्टान की हो, अब नासा की अरबो-करोडो मील दुर ली तस्वीर से कैसे सिद्ध किया जा सकता है कि वह आकृति इंसान है एलियन है या चट्टान। नासा द्वारा ली गयी रामसेतु की तस्वीरे भी इसके मानवनिर्मित होने की पुष्टी कहा करती है? नासा के प्रवक्ता का भी यही कहना है। इतिहासकार तो राम के अस्तित्व पर .....

विद्यार्थी की इस बात पर शांत बैठे भगवाई इतने भडक उठे, कि उत्तेजनावश चार्वाक के “प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्!” के वेदविरोधी तर्क के बाण तक प्रोफेसर और उनके चेले पर दागने लगे। इस हो-हल्ले ने धीरे-धीरे एक बार पुन: सांप्रदायिक रंग लिया, इस बार वाद-विवाद में सभी धर्मो के नुमाइंदे कुद पडे, शांति समिति का कार्यकर्ता भी इस दफा फेल रहा। इस जुतमफैक के माहौल में चौपाल छोड पुस्तकालय जाते हुवे प्रोफेसर साहब अपने कला के विद्यार्थी को बता रहे थे कि उनकी इंटरनेटिया खोजबीन के अनुसार ये एलियन वास्तव में “जलपरी के स्टेच्यू की तस्वीर” है जिसे फोटोशाप नाम के साफ्टवेयर की मदद से नासा के यान द्वारा ली तस्वीरो के साथ जोड दिया गया है। .....

कबीरा

मंगलवार, 22 जनवरी 2008

समाजवाद: यथार्थ के धरातल पर

पूँजीवाद को लाल सलाम लेख में अनिल त्रिवेदी द्वारा वामपंथीयो की निंदा के विरूद्ध खुला पत्र।

घोर कलयुग हैं भाई! हिन्दोस्तान में “सर्वहारा की राजनीति” के अंतिम बचे झंडाबरदारों को गाँधीवादी समाजवादी, पूँजीवादी विचारक, एन.जी.ओ., तथाकथित बुद्धिजीवी, उग्र वामपंथी, कारपोरेट मीड़िया सभी मार्क्सवाद सिखाने पर आमादा है। ज्योति बसु के कथित “समाजवाद अभी संभव नहीं” बयान पर जैसा बवाल मचाया गया उससे ऎसा लगने लगा कि जैसे मानो देश में आज ही क्रांति की जाना हो और वामपंथी इस क्रांति के राह में सबसे बड़े रोड़े हो। हिटलर के फासीवाद को आदर्श मानने वाले संघ परिवार ने तो एक कदम आगे बढ़कर माओवादीयों के सूर में सूर मिलाते हुवे भारतीय कम्युनिस्टों को चीन का अनुसरण तक करने की समझाईश दे ड़ाली। उधर ज्योति बसु की टिप्पणी के बहाने अव्यवहारिकता के धरातल पर खडे तथाकथित प्रगतिशील-समाजवादी चिंतको ने “वैचारिक दरिद्रता” का परिचय देते हुवे एक बार पुन: “समाजवाद” के हसीन ख्वाब को वामपंथी यथार्थवाद की चुनौती के रूप में पेश करने का प्रयास किया।

रही बात “समाजवाद त्यागने” संबंधी बयान की तो ऎसी कोई भी टिप्पणी ज्योति बसु ने कभी की ही नही। इसके विपरीत 22 वें बंगाल राज्य सम्मेलन के अवसर पर ब्रिगेड मैदान पर दसियो हजार लोगो की रैली को संबोधित करते हुवे ज्योति बसु ने कहा कि :- “हम मार्क्सवादी व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन चाहते है क्योकि हमारा अंतिम लक्ष्य वर्गविहीन और शोषणविहीन समाज की स्थापना के लिये समाजवाद निर्माण का है। लेकिन मात्र तीन राज्यो में अपनी सरकारों के दम पर यह लक्ष्य तत्काल हासिल करना संभव नहीं है। समाजवाद की प्रगति तभी हासिल की जा सकती है, जब वामपंथी व जनतांत्रिक शक्तिया इतनी मजबूत हो जाए की राष्ट्रीय स्तर पर एक विकल्प का निर्माण कर सके। जनता का विश्वास जीतकर मार्क्सवादी इस लक्ष्य को हासिल करने के भरसक प्रयास करेंगे।” इस टिप्पणी से हमारे प्रिय बुद्विजीवी जो मतलब निकालना चाहे निकाले, लेकिन ज्योति बसु की उपरोक्त टिप्पणी व बुद्धदेव, प्रकाश करात के बयानो में कहीं कुछ भी नया नहीं है, यह तो माकपा के तीन दशक पुराने पार्टी कार्यक्रम की लाईन है। हमारा कार्यक्रम तो दशको से देश के सामने है, लेकिन क्या हमारे समाजवादी बंधु स्पष्ट करेंगे कि भारत में समाजवाद स्थापना के लिये उनके पास क्या कार्यक्रम है? समाजवाद-समाजवाद का नारा लगाने से समाजवाद का निर्माण नहीं होने वाला। पूँजीवाद को कोसकर व समाजवाद को आस्था का प्रश्न बनाकर बहस से बचा जाना प्रगतिशील ताकतो के घोर गैर-जिम्मेदाराना चरित्र का द्योतक है। समाजवाद हासिल करने के राह में मौजूद चुनौतियों से जुझने व जनता को लामबंद करने की जिम्मेदारी समस्त प्रगतिशील ताकतो की है, लेकिन आज भारतीय वामपंथ को कोसने के अलावा इस दिशा में वे (गैर-वामपंथी प्रगतिशील ताकते) ओर क्या कर रहें है स्पष्ट करना चाहिये।

वामपंथी व जनतांत्रिक विकल्प को और विकास के अखिल भारतीय पूंजीवादी माडल के दायरे में एक हद तक सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए किये जा रहे संघर्ष का जनता के बीच बढ़ता हुआ समर्थन माकपा का किसी मृतप्राय: डोग्मा के बनिस्बत अपनाये गये अधिक व्यवहारिक रणनीति की प्रासंगिकता का सबूत है। साम्राज्यवाद के बाजारवादी हमलो के बीच अंतिम आदमी के अधिकारों की रक्षा “समाजवाद” का यूटोपियाई स्वप्न नहीं कर सकता। लक्ष्य प्राप्ति के लिये एक मंच पर आकर देश में व्यवहारिक सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक विकल्प पेश करना समस्त प्रगतिशील-वामपंथी ताकतो का फर्ज है और यही आज की ऎतिहासिक जरूरत भी है।

शुक्रवार, 18 जनवरी 2008

भूमंळलीयकरण परमोधर्म!


प्रदीप भाई,
रोज सुबह अखबारों के पन्नो में विज्ञापनों के बीच खबरे खोजना गालीबन अपन जैसे बचे-कुचे फुर्सतिया-फालतु “आम लोगो” का ही शगूफा बचा है, आज की इस “भागदौड की जिंदगी” (इसके बारे में आगे कभी विस्तार से चर्चा करेंगे) में “खास इंसान” को दुनिया की खबरों की जानकारी से क्या लेना देना, वैसे भी इस फालतू माथापच्ची का काम उनका तो है ही नहीं। खेर छोडीये, उन्हें शेयर की कीमतो की पल-पल की जानकारी देने के लिये चोबीसो घंटे न्यूज चेनल व इंटरनेट तो है ही। साहब बुरा मत मानना, यह हिन्दोस्तान है पाकिस्तान नहीं! लेकिन कुछ तो वजह जरूर होना चाहिये जो पाक को हिन्दोस्ता का अक्स कहा जाये। गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी, निराशा, कुंठा, महंगाई, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता और साम्राज्यवादी हमला सरहद को धता बता रहा हैं वही साहित्य, कला, संस्कृति, इतिहास, विरासत भी हमारी साझा है। बस एक फरक मुझे दिखाई देता है वो है “लब की आजादी का”। हमें नक्कारखाने में तूती बजाने का अधिकार इस “प्रजातंत्र” ने जरूर दे दिया है पर सुने जाने का नहीं। इस एक मामले में कम-से-कम पाक की अवाम हमसे ज्यादा खुशकिस्मत निकली, आखिर पत्थर पर सिर फोडने का क्या फायदा? जब सुना ही न जाना हो तो लब की आजादी का क्या फायदा।एल.पी.जी. के ढिंढोरचियो ने कार्पोरेट मिडिया की मदद से ऎसा उन्माद का माहौल तैयार किया है जिसमें आम आदमी ही आम आदमी का दुश्मन बन गया है और खास आदमी इस सिरफुटव्वल का आनंद ले रहा है। “सांस्कृतिक विरासत” जैसा कुछ भुमंळलीयकरण के इस दौर ने बचा रहने दिया नही है। ऎसी विरासतो का जो मुसीबत के समय दुर्बल की लाठी न बन सबल को ही बल दे उनका इतिहास के कूडेदान में डाल दिये जाने का विलाप कम से कम हम जैसे बूतपरस्त तो कभी न करेंगे। अपने निकृष्ठतम रूप में इजारेदार वैश्वीक पूंजी आज नंगई के साथ सारी दुनिया पे छा जाने को बेताब है, और ऎसी विकट परिस्थिती में स्थानिय पूंजी के प्रतिनिधियो ने अपने देश के समाज, संस्कृति, सभ्यता, कला, साहित्य, इतिहास, धर्म, दर्शन, राजनीति को वैश्वीक पूंजी के लिये अनुकूलित करने का बीडा अपने कंधे पर उठा लिया है। आज जो संस्कृति फलफूल रही है, वो है - लाखो के पैकेजो की संस्कृति, महंगे मोबाईलो की संस्कृति, नित नये आ रहे इलेक्ट्रानिक गजेंटो की संस्कृति, क्रेडीट कार्डस की संस्कृति, रिटेल बाजार की संस्कृति, माल्स की संस्कृति, मेकडोनल्डस की संस्कृति, विज्ञापन की संस्कृति, शेयर बाजार की संस्कृति, ब्ला-ब्ला-ब्ला और न जाने कौन-कौन सी संस्कृति, संक्षेप में कहे ये सब संस्कृतिया “भुमंळलीयकरण की संस्कृति” का हिस्सा है। सोचकर बडा आश्चर्य होता है लेकिन “बहुसंख्यको” पर “अल्पसंख्यको” के राज को नयी सहस्त्राब्दी में पूंजी ने बुलंदी पर पहुचा दिया है। राजधानी में किसानों की आत्महत्याओ और उनके सवालों को लेकर जाने वाले जुलुसों के लिये स्थान नहीं है, लेकिन अंबानियों और पूंजीपतियो की मैराथन के लिये दिल्ली को संभालते पुरा प्रशासन जुटा नजर आता है यह भी संस्कृति का हिस्सा है । धर्म के नाम पर जुलुस स्वागत योग्य है पर मजदुर-किसानों की रैलीया जनता के लिये सरदर्द है यह भी संस्कृति का हिस्सा है । सांप्रदायिक दंगो के कारण चाहे कितने ही दिन शहर विराने रहे लेकिन मजदूर-किसानों की जायज बंद हडताले गैरकानूनी है यह भी संस्कृति का हिस्सा है । निजी चैनलों के धारावाहिकों में पग-पग पर स्त्रीयों का अपमान किया जा रहा है, अंधविश्वासों को बढावा दिया जा रहा है, कुरूतियों को जायज ठहराया जा रहा है यह भी संस्कृति का हिस्सा है । भगवानों को तो पहले ही बाट दिया गया था लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों को भी धर्म के आधार पर बाटने की संस्कृति चलन में आ रही है यह भी संस्कृति का हिस्सा है । वही बाजारवादी ताकते हमारी माटी के सपूतो को भी बेचने से बाज नही आ रहें है। “चे” को न जानने वाले लाखो नवयुवकों की पंसद “चे टी शर्ट” है यह संस्कृति हमारे यहा भी चल पडी है। भगत सिंह, चे, हसिया-हतौडा के फोटो वाले टी-शर्ट पहन माडल गर्व से कैट वाक कर रहे है, मजदूर-किसानों से अंतिम बचे प्रतीकों को भी छिनने की साजिश रची जा रही है यह भी हैं बाजारवादी संस्कृति का हिस्सा है । वाकई सोवियत-संघ न रहने की भारी कीमत तीसरी दुनिया के अंतिम आदमी को चुकानी पड रही है। सत्तावाद विरोधी विचारधारा का मिडिया में बढता प्रचार-प्रसार साम्राज्यवाद का “आम आदमी को राजनीती” से विरक्त करने के षडयंत्र का हिस्सा है इस षडयंत्र को बेनकाब कर आम आदमी की राजनीती को बल देने की संस्कृति की आज सबसे ज्यादा जरूरत है। तो कुल मिलाकर यह है पूंजी और हमारी सांस्कृतिक विरासत के बीच बनाये जा रहें समीकरण का नतीजा। बहस जारी है शब्दों, विचारों और समय की भी सीमा है लेकिन बहस में फिर मिलेंगे। सार्थक बहस आयोजित करने के लिये धन्यवाद।
कबीरा

जल्लिकट्टू

खबर है कि सर्वोच्य नयायालय ने अपनी (अति) सक्रियता के रिकार्ड को बरकरार रखते हुवे तमिलनाडु में आयोजित की जाने वाली पारंपरिक “जल्लिकट्टू” अर्थात “सांड़ो की लडाई” पर प्रतिबंध लगा दिया। देखा जाए तो खबर में कुछ भी खास नही लगता है पर अपने खबरची तो खबरची ठहरे जिसे चाहे खास बना दे जिसे चाहे खाक, वैसे भी विज्ञापनों के बीच छोटी-मोटी खबरे छापना उनकी पुरातन मजबुरी ठहरी। पर ये बात कबीरा की समझ से परे है कि न्यायालय के हालिया फैसले की खबर से हमारे मोहल्ले के छुटभय्यो को भला क्यो सांड सूंघ गया।

वैसे भी प्रतिबंध लगाने या हटाने का आजकल फैशन है, हमारी “सांस्कृतिक पोलिस” तो अनेको वर्षो से ख्रिसमस की प्रार्थनाओं पर, ताजियो पर, चित्र प्रदर्शनियों पर, हबीब तनवीर के नाटको पर, आमिर की फिल्मों पर, युवक – युवतियों के प्रेम के इजहार पर या लडकीयों के जिंस या स्कर्ट पहनने पर लाठी के जोर पर प्रतिबंध लगवाते आये है इनकी लाठी का जोर सांडो ने तो क्या सारे देश ने देखा है। कहा जाता है कि जिस तरह ताले शरीफो के लिए होते है उसी तरह प्रतिबंध भी शरीफो के लिए होते है लेकिन अपवाद भी बगैर ढुंढे ही मिल ही जाते है। अब जरा आप ही देखिये समस्त सामाजिक-सांस्कृतिक-कानूनी बंधनो से परे हमारे शरीफ खाकी नेकर - केसरिया दुपट्टाधारी ठुल्ले सती महिमामंडन, नंगे शस्त्रो को लेकर जुलुस निकालने, बहुविवाह करने, दहेज लेनदेन पर लगे प्रतिबंध हटवाने के लिये अपने घर से लेकर दिल्ली तक जंगी संघर्ष कर चुके है।

पुराने गिले शिकवे भुलाकर संक्रांति के शुभ अवसर पर फार लेफ्ट से फार राईट, जी।ओ। से एन.जी.ओ., भगवा पार्टी से पंजा पार्टी, हिन्दू-मुस्लिम-इसाई-… सभी धर्मो के छटे हुवे कट्टरपंथीयों की एक सर्वदलीय बैठक आयोजित की गयी। खबर लगते ही कबीरा भी चौपाल पर जा पहुचा, वहा पता चला कि - भगवा पार्टी बडी दुखी है कि माननीय सर्वोच्य अदालत भला कैसे ऎसा कोई भी प्रतिबंध लगवा सकती है वो भी तमिलनाडू में। यह तो सरासर उसके अधिकार क्षेत्र के अतिक्रमण का मामला है। अभी हाल ही में भगवा पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने धर्मसभा में प्रवचन दिया कि धर्म के बगैर राजनीति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है, कि वे धर्म की राजनीति करते है और ताउम्र करते रहेंगे। इस तरह भगवा पार्टी के अनुयायियों के लिये आगामी चुनावो तक रामसेतु जैसे धर्म की रक्षा के ज्चलंत धार्मिक मुद्दे को छोड कोई दूसरा मुद्दा जबान पर भी लाया जाना धर्मद्रोह अर्थात राजद्रोह का मामला बनता है, वैसे भी सांडो की लडाई जैसे पारंपरिक खेल पर रोक लगाना हिन्दू संस्कृति का अपमान है। लेकिन क्या करे मजबूरी का नाम महात्मा गांधी! कानून का उल्लंघन करना या अदालती आदेशो की अवहेलना करना एक अलग बात है वो तो हम आजादी के बाद से ही करते आये है, लेकिन माननीय सर्वोच्य न्यायालय के किसी भी आदेश को मौखिक या सैद्धांतिक चुनौती देना “आ सांड मुझे मार होगा”, अखबारो में बडी-बडी खबरे छपेंगी, टीवी पर बहसे चलेंगी, सभी दुर बडी थू-थू होगी। वैसे भी बडे-बुजुर्ग कह गये है कि राजधर्म के अनुसार ऎसी किसी भी विकट परिस्थिती से बचे रहने में ही पुरूषार्थ है “राज बचा तो लाखो पाये”। अब भला भगवा पार्टी कोई लाल झंडे वाली पार्टी तो है नही जो मजदूरो की हडताल पर लगाये न्यायालयिन प्रतिबंध को चुनौती दे अथवा न्यायापालिका द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन कर विधायिका के मामलो में टांग अडाने जैसे जनता को समझ में न आने वाले गंभीर मसलो पर न्यायपालिका से ही पंगा लेती फिरे।

वही पंजा पार्टी के भय्यो की समस्या कुछ दुसरी ही थी, उनका कहना था कि - आज सांडो की लडाई पर प्रतिबंध लगा दिया, यदि कल को शेरो के बाजार में सांडो की उछलकुद पर रोक लगवा दि तो बेचारे मनमोहन-चिदंबरम के विजन 2020 का क्या होंगा, बुश साहब भी बोत नाराज हो सकता है। अरे प्रतिबंध लगाना ही था तो इन साले माकपाईयो के विटो पर लगाना था जो गाहे-बगाहे सरकार की अमीरी - अमीरीका परस्त, बुश परस्त, ब्ला-ब्ला-ब्ला परस्त नितीयो पर प्रतिबंध लगाता है। उधर परमाणु करार के मसले पर भी इन्होंने ब्रेक …

भगवा पार्टी के प्रवक्ता ने पंजाईयो की बात काटते हुवे कहा कि - यह सब तो ठीक है अरे देखा नहीं क्या कैसे इनके नेताओ के एक बयान पर शेर बाजार का गुस्सैल सांड फुस्स होकर बेदम सा गिर पड पडता है। कबड्डी जाये, हाकी जाये, क्रिकेट भी जाये चुल्हें में हमारी बला से, लेकिन शेर बाजार में सांडो की घुड-दौड ऎसे ही सरपट चलते रहनी चाहिये, आज 21 हजार, कल 21 लाख, परसो 21 करोड़…। इस मसले पर भगवा-पंजा पार्टी की एक राय बनी, आखिर हो भी क्यो न यह इंडिया के 50 लाख अल्पसंख्यको के अस्तित्व का सवाल है। इन अल्पसंख्यकों के अलावा देश के संवेदी सूचकांक पर एफ।आई।आई. और उनकी मदद से देश में पी.एन. के गणित से आये वेश्वीक पूंजी के मालिको की रक्त मुद्रा का भी भविष्य टिका हुवा है, खुदा-न-खास्ता अगर लाल रंग देख शेर बाजार का सांड बिगढ़ गया तो सब कुछ चौपट हो जायेगा।

मोहल्ले के बुद्धिजीवी छाप एन।जी.ओ. कार्यकर्ता ने आगे चौपाल को संबोधित करते हुवे कहा कि – विरोध करना तो हमारा धंधा है ये न्यायालय को क्या हो गया है? अरे अगर प्रतिबंध लगाना ही था तो बंगाल की जनता पर भी लगाया जा सकता था जिसने सिंगुर फिर नंदीग्राम में फार लेफ्ट से फार राईट, जी.ओ. से लेकर एन.जी.ओ. के गठजोड की नाकाबंदी क्रांति, दो दर्जन से भी ज्यादा माकपा काडरो की हत्या, चार हजार से भी ज्यादा माकपा समर्थकों का ग्यारह माह के वनवास, 24 घंटे मिड़िया में माकपा विरोधी प्रचार के बावजूद बालागढ़ विधानसभा सीट के लिए हुवे उपचुनाव में माकपा प्रत्याशी को जितवा दिया।बैठक के आखिर में छुटपुट विवादो के बाद सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसका निम्नलिखित मजमून एक सांध्य दैनिक के मुखपृष्ठ पर चार “सी” (क्रिकेट-सिनेमा-क्राईम-कामेडी) तथा पाचवे “एस” (फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी और उनकी प्रेमिका कार्ला ब्रूनी के रोमांस के गासिप) के बीच संपुर्ण सम्मान के साथ एक कालम में छापा गया।

“ममता बेण द्वारा टाटा की लखटकिया कार नेनो के विरोध को नजरअंदाज किया जाना दुखद है इससे भी अधिक दुखद है इस विरोध पर मिडीया का रवैया। बंगाल की जनता ने (भारतीयता का परिचय देते हुवे) माकपा को उपचुनाव में जिताकर इंडिया की जनता के साथ विश्वासघात किया है, हम इसका विरोध करते है साथ यह प्रण भी लेते है कि बंगाल की जनता के माथे पर लगे इस कलंक को पोछ कर रहेंगे। सिंगूर, नंदीग्राम में जो न हो सका हम नवचार में करके दिखाएगे, 30 साल तक गरीब किसानो को भूमि का वितरण भले ही करते रहे हो लेकिन चाहे जो हो बंगाल का ओद्योगिकीकरण माकपा को कभी न करने देंगे। देश में एक बडा आंदोलन खडा करके सुप्रिम कोर्ट के द्वारा बंगाल की जनता का बार-बार माकपा को वोट डालना प्रतिबंधीत करवाकर ही दम लेंगे।”

इसी अखबार के अंदर के किसी पन्ने पर एक खबर छपी थी जिसका शीर्षक था – “सुप्रिम कोर्ट के आदेश के बावजुद सांड़ो की लडाई का खेल जारी”। लेकिन माकपा के बालागढ़ उपचुनाव में जीत दर्ज करने की खबर को कबीरा अखबारों, पत्र-पत्रिकाओ, खोजी न्यूज-व्यूज चेनलो से लेकर इंटरनेटीया ब्लागो तक कही भी ढुंढ न सका।

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